The Incisive Pen

रोनकी राम के ‘प्रबुद्ध’ डेरे

रोनकी राम सिखों के प्रति नफरत घोलकर दलितों को डेरों के लिए फुट सोलजर तैयार कर रहे हैं। बड़े अफसोस की बात है कि यह दलित चिंतन के नाम पर स्वीकार किया जा रहा है।

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रोनकी राम के ‘प्रबुद्ध’ डेरे

रोनकी राम सिखों के प्रति नफरत घोलकर दलितों को डेरों के लिए फुट सोलजर तैयार कर रहे हैं। बड़े अफसोस की बात है कि यह दलित चिंतन के नाम पर स्वीकार किया जा रहा है।

Professor Ronki Ram

कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥ (गुरु ग्रंथ साहिब, महला ३, पृष्‍ठ 84)

अर्थ: जल जाए (पहचानी जाए) वह कलम, समेत दवात के, और वह कागज भी जल जाए।
लिखने वाला भी जल मरे, जिसने दूजी भावना (माया के प्रभाव) के अधीन होकर लिखा हो।
हे नानक! (जीव) पहिले से (किए हुए अच्छे-बुरे कर्मों) के अनुसार (अपने संस्कार खुद) लिखता है और वही कमाता है; वह इस के उलट कुछ नहीं कर सकता।

पंजाब युनिवर्सिटी, चंडीगढ़, के कला विभाग के प्रोफ़ेसर रोनकी राम का नाम प्रमुख दलित चिंतकों की श्रेणी में आता है। यूं भी कह सकते हैं कि प्रमुख श्रेणी में स्थापित किया गया है। पंजाब युनिवर्सिटी के ऊपर हिंदुत्वी केंद्र सरकार का हस्तक्षेप दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। मई 2017 की एक जांच रिपोर्ट के अनुसार सात सहायक प्रोफेसरों के अनुसूचित जाति (एस.सी.) और पिछड़ा वर्ग (बी.सी.) प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए थे। फ़रवरी 2020 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंजाब युनिवर्सिटी के कुलपति सहित छह लोगों को यह जानने के लिए नोटिस जारी किया कि अब तक इस फर्जी एस.सी. / बी.सी. प्रमाण पत्र मामले में क्या कार्यवाही हुई है, या कोई कारवाही क्यों नहीं हुई। पंजाब युनिवर्सिटी की बढ़ती फीसों और घटते वज़ीफ़ों का भी सबसे बुरा असर गरीब और दलित छात्रों के ऊपर ही पड़ रहा है। इस सब के चलते युनिवर्सिटी परिसर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन बढ़ते जा रहे हैं।

प्रमुख दलित चिंतक प्रोफ़ेसर रोनकी राम का इस सब में दलितों की मुश्किलों के निवारण में क्या योगदान है, कोई खबर नहीं। हिन्दुत्वी सरकार बड़े सुनयोजित ढंग से अपने पसंद के लेखक, प्रोफ़ेसर या कुलपति को देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में फिट कर रही है, और दूसरों को आगे आने का हर अवसर बंद कर रही है। क्या प्रोफ़ेसर रोनकी राम को स्थापित करने का मकसद भी दलित चिंतन को अनुकूल दिशा देना है? इस प्रश्न का उत्तर रोनकी राम के लेखों में दर्ज सूचना की जगह आंतरिक भाव का गंभीरता से विश्लेषण करने से मिल जाता है।

इनके अंग्रेज़ी में छपे लेख खोजी रसाले के तौर पर परोसे जाते हैं। बाहरी तौर पर किसी को लग सकता है कि रोनकी राम तो ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं। लेकिन ब्राह्मणी तंत्र को ऐसे विरोध से कोई फ़र्क नहीं पड़ता अगर विरोधी आपस में विभाजित रहें। ब्राह्मणी तंत्र अपने विरोधियों की आपसी फूट में से ही अपना क़िला मज़बूत कर लेता है। ब्राह्मणी तंत्र से पीड़ित विभिन्न जनजातियां एक मंच पर ना आने पाएं, एक- दूसरों से भिड़ती रहें, रोनकी राम के लेख दलित चिंतन को इसी दिशा में ले जाते हैं।

रोनकी राम के ‘प्रबुद्ध’ डेरों का ज़िकर करने से पहले उनके द्वारा किसान आंदोलन पर लिखे लेख की चर्चा लाभदायक होगी। किसान आंदोलन ने बड़ी-बड़ी हस्तियों की असलियत जनता के सामने उधेड़ कर रख दी थी। यह किसान आंदोलन की आलौकिकता है कि बदनियत से लिखने वालों का भी खुद-ब-खुद नकाब उतर जाता है। क्योंकि इस आंदोलन ने दो विचारधाराओं को बड़ी स्पष्टता से आमने सामने रख दिया था। इस पर लिखने वाले भी दोनो में से एक खेमे के साथ खड़े होने से खुद को छुपा नहीं सकते। रोनकी राम चाहे जितने भी संतुलित शब्दों का जाल बिछाना चाहें, उनका खेमा स्पष्ट नज़र आ जाता है। रोनकी राम ने इस आलौकिक व ऐतिहासिक आंदोलन पर लिख कर हमारा काम आसान कर दिया है। अब पाठकों के लिए समझना आसान हो जाएगा।

साल 2020-2021 में चला किसान अंदोलन मानव सभ्यता के लिए कीमती तोहफे से कम ना था। पूरी दुनिया में इसके ऊपर ढेरों लेख छपे। सिख धर्म के मूल्य इस अंदोलन के लिए प्राणवायू थे, जिसका हर लेखक और विश्लेषक ने खुल कर वर्णन किया। इस वर्णन से तो भारत की हिन्दुत्वी सरकार को चिढ़ है। दुनियाभर में सरकार की हुई फजीहत को कुछ कम करने के लिए शोध पत्रों के रूप में पेश किया जाना मददगार तो हो ही सकता है। ऐसे शोध पत्र जो तीन कृषि (काले) कानूनों को सरकार की ‘सुधारवादी’ नियत या मजबूरी बताए; अंदोलन प्रति सरकार की क्रूरता को कम करके पेश करें; और मोर्चे में सिख मूल्यों को गायब कर दें। इसी सरकारी मंशा की पूर्ती के लिए पंजाब युनिवर्सिटी के ‘दलित चिंतक’ प्रोफ़ेसर रोनकी राम का अंग्रेज़ी में एक लंबा शोध पत्र छपा। लेख का शीर्षक- Agrarian Resistance in Punjab: Contextualising Farmer Protests at the Gates of Delhi in a Historical Perspective (पंजाब में कृषि प्रतिरोध: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दिल्ली के द्वारों पर किसान विरोध को प्रासंगिक बनाना)।

रोनकी राम 1906 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा लाए पंजाब भूमि औपनिवेशीकरण अधिनियम के किसान विरोधी प्रावधानो का वर्णन तो करते हैं। लेकिन 2020 में पारित हुए अध्यादेशों के प्रावधान, जो इसे ‘काला’ कानून बनाते थे, के बारे में रोशनी डालना ज़रूरी नहीं समझते। जिस असंवैधानिक ढंग से बिना चर्चा और जबरन ध्वनि मत से इन्हें पारित किया गया उसे कलमबंद करने की भी ज़रूरत नहीं समझी।

रोनकी राम ने सरकार के सुधारवादी पक्ष के समकक्ष किसानों के शंकों का पक्ष रख कर, तानाशाह और उत्पीड़ित में संतुलन बनाने का कार्य किया। इस संतुलन के साथ "किसान विद्रोह की गौरवशाली परंपरा" को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लिखा है। इस तरह पंजाब के किसानों को (आजादी से पहले और बाद वाली) पिछली सरकारों के खिलाफ बार-बार आंदोलन करने के कारण उनका ‘आंदोलनजीवी’ बन जाने का प्रासंगिक वर्णन बन जाता है। रोनकी राम सरकार की नियत को पाक साफ पेश करते हैं:

"2020* के बाद से, सभी केंद्र सरकारों ने कृषि क्षेत्र में सुधार शुरू करने के लिए राज्यों को मनाने के लिए कई प्रयास किए। हालाँकि, राज्य सरकारें प्रस्तावित कृषि सुधारों में रुचि नहीं ले रही थीं, शायद किसानों के विरोध की आशंका के कारण, और इसमें शामिल मामले के संघीय पक्ष को देखते हुए, वर्तमान एन.डी.ए. केंद्र सरकार ने 5 जून, 2020 को इसमे डुबकी लगाई।"

(*साल 2000 होना चाहिए था, गल्ति से 2020 लिखा गया हो सकता है)

कृषि विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ लिखते हैं:

"इन कानूनों की कानूनी-भाषा भी (निम्न-स्तरीय) कार्यपालिका को न्यायपालिका में बदल देती है। वास्तव में, न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद में। यह किसानों और उन विशाल कारपोरेट के बीच ताकत के पहले से ही सबसे अन्यायपूर्ण असंतुलन को भी बढ़ाता है, जिनसे वे निपटेंगे।" (द वायर, 9 दसंबर 2020)

भाजपा सरकार के घिनौने और क्रूर अपराधों की धार को कुंठित करने के साहित्यक अपराध से भी रोनकी राम पीछे ना रहे:

"हालांकि विरोध के दौरान किसानों को नामों से पुकारा जाता रहा, लेकिन गणतंत्र दिवस की घटना के बाद इस तरह की मैली बातों की तीव्रता तुरंत बढ़ गई। कृषि कानूनों का समर्थन करने वालों ने विरोध कर रहे किसानों को खालिस्तानी, अर्बन-नक्सल और यहां तक कि माओवादी भी कहा। अक्सर यह भी सुनने में आया था कि दिल्ली की सीमाओं पर विरोध करने वाले असली किसान नहीं हैं।"

जहां से "यह भी सुनने में आया था" उन "कृषि कानूनों का समर्थन करने वालों" का नाम क्यों ना लिखा गया?
शायद किसानों को अभद्र नाम देने वाले भाजपा के मंत्री, मुख्य मंत्री, कैबिनेट मंत्री, विधायक, या सांसदों की गिणती ढेरों में थी, जिस कारण रोनकी राम को उन में से चुनाव करने में दिक्कत आ रही होगी। अगर ऐसा था, तो कम से कम प्रधान सेवक का ज़िकर करना तो बनता ही था। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 फरवरी 2021 को राज्य सभा में दिए अपने भाषण में किसानों को ‘अंदोलनजीवी’ और ‘परजीवी’ नाम दिए जिसे रोनकी राम भूल गए। विपक्षी पार्टी कांग्रस या किसान नेता के ब्यान के हवाले से "मोदी सरकार" या "नरेंद्र मोदी सरकार" का टूक मात्र ज़िकर आया है। लेकिन रोनकी राम ने खुद से निश्चित किया कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी’ का नाम लिखे बिना "केंद्र सरकार" को ही सामने रखा जाए। क्या इस नाम को लिखे बिना किसान आंदोलन पर किसी लेख को शोध-पत्र कहा जा सकता है? क्या गब्बर सिंह का नाम लिखे बिना, केवल रामगढ़ के डाकू लिखकर, शोले फिल्म की कहानी सुनाई जा सकती है?

3 अक्तूबर 2021 को लखीमपुर खीरी की दर्दनाक घटना ने सभी को स्तंभित कर दिया था। केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी की गाड़ी से उसी के लड़के ने शांतिपूर्ण किसानों के ऊपर जान-बूझकर चढ़ा दी थी। रोनकी राम इस घटना को भी दो गुटों की आपसी झड़प की तरह पेश करते हैं जिसमें दोनो तरफ का बराबर नुकसान हुआ:

"यह इस स्थल पर विरोध के दौरान था कि एक वाहन ने हत्या के इरादे से शांतिपूर्ण सभा के विरोध कर रहे किसानों के ऊपर चढ़ा दिया, जिसमें चार (नक्षत्र सिंह, दलजीत सिंह, लवप्रीत सिंह और गुरवेंद्र सिंह) की मौत हो गई। मृत पाए गए नौ में से अन्य चार खबरों के अनुसार भाजपा कैडर के थे। वे काफिले के वाहन में यात्रा कर रहे थे और प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित तौर पर उन्हें घसीटा गया और पीट-पीट कर मार डाला गया। नौवीं मौत पत्रकार के तौर पर पहचाने जाने वाले रतन कश्यप की रिपोर्ट हुई थी, जो एक टीवी समाचार चैनल के लिए हिंसा की घटना को कवर करने घटना स्थल पर मौजूद था।"

कई अहम त्थय हैं जिनका ज़िकर किए बिना इस घटना के बारे में लिखना बईमानी है। जैसे- सोशल मीडिया पे हुआ वायरल वीडियो जिसने क्रूरता को उजागर कर दिया और सरकार पे कुछ दबाव बन पाया। हत्या केवल "वाहन" से नहीं, ‘केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के वाहन’ से हुई। हत्या के बाद भी केंद्रीय राज्य मंत्री (वो भी गृह मंत्रालय) लगातार मंत्रालय में बना रहा। प्रधान मंत्री ने जांच में पारदर्शिता के ढोंग के लिए भी उसे नहीं हटाया। भाजपा कैडर वालों को "पीट-पीट कर मार डाला" लिखने से पहले यह नहीं बताना चाहिए था कि गाड़ी में बैठे गुंडो ने भीड़ के ऊपर गोलियां भी चलाई? दोनो तरफ चार मौतों का आंकड़ा बराबर रखने के चलते पत्रकार की मौत को ना इधर का ना उधर का छोड़ा। चश्मदीद और परिवार वालों के मुताबिक पत्रकार की मौत भी गाड़ी से कुचले जाने से ही हुई थी।

गुरुद्वारों और विभिन्न सिख संस्थाओं द्वारा संचालित लंगर के बिना किसान मोर्चे का ज़िकर तो हो ही नहीं सकता। रोनकी राम को भी लंगर का वर्णन करना पड़ा, लेकिन ऐसी व्याख्या पहले ना किसी ने पढ़ी ना सुनी होगी:

"दुनिया भर में चर्चित दिल्ली की सीमा पर किसानों के धरना स्थल का एक और पहलू है लंगर (सामुदायिक रसोई)। लंगर संयुक्त रूप से भाग लेने वाले किसानों - पुरुषों और महिलाओं - द्वारा तैयार किया जाता है और किसानों द्वारा उनके सामुदायिक स्रोतों के साथ-साथ सहानुभूतिपूर्ण परोपकारी प्रवासियों द्वारा दान किए गए प्रावधानों से प्रबंधित किया जाता है। लंगर न केवल किसानों के लिए खुला है, बल्कि जाति, रंग और पंथ के बावजूद सभी के लिए खुला है।"

ऐसा लगता है रोनकी राम ने कई दिन की सोच-विचार और अपनी बौद्धिकता की चरम तक जा कर लंगर की इस परिभाषा को शब्द दिए होंगे। किसान मोर्चे पर चल रहे लंगर का ‘सिख’, ‘गुरुद्वारा’ या ‘गुरु नानक’ शब्दों का ज़िकर किए बिना परिभाषित कर देना किसी अचंभे से कम नहीं। सिख विरोधी मानसिकता से भरी धूर्तता को शोध पत्र में समा जाने वाले शब्द देना हर किसी बुद्धिजीवी के बस की बात नहीं।

वहीं दूसरी तरफ कांचा इलैया शेफर्ड भी जाने माने दलित चिंतक हैं। उन्होंने ने किसान अंदोलन पर भी लिखा और लंगर के बारे में भी:

"किसानों के विरोध का नेतृत्व पंजाब के सिख क्यों कर रहे हैं...
एक और कारण है कि सिख किसानों ने श्रमिकों के लिए गदा उठाई है, जिसे सिख धर्म में बहुत सम्मान दिया जाता है। और इसकी जड़ें सिखों के बीच जातिवाद को क्षीण करने के सापेक्ष हैं।...
एक बार जब गुरु नानक देव ने सिख धर्म की स्थापना कर दी और उनकी और अन्य सिख गुरुओं की शिक्षाओं और भजनों को एक साथ धार्मिक ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित कर दिया, तो इसने समुदाय की वर्ण व्यवस्था और श्रम-तिरस्कार से मुक्ति की नींव रखी।...
इसका मतलब यह नहीं है कि दलित सिख, जिन्हें मजहबी सिख भी कहा जाता है, को पंजाब में सामाजिक भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है। करना पड़ता है। लेकिन सिख समुदाय हिंदुत्ववादियों की तरह जातिवादी और वर्ण धर्म के अनुयायी नहीं हैं।...
पंजाब की कृषि की उन्नति की जड़ें खेत में काम करने वाले सभी लोगों के सम्मान के साथ सामाजिक आधार पर हैं। इस प्रकार, पंजाब भारतीय संघवाद के भीतर एक अलग सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित हुआ है।...
गुरुद्वारे - विशेष रूप से अमृतसर का स्वर्ण मंदिर - अपने लंगरों के लिए जाने जाते हैं जहाँ कोई भी आगंतुक निशुल्क भोजन कर सकता है और यहाँ तक कि सिख समुदाय के अमीर सदस्य भी खुल कर श्रम में भाग लेते हैं। मंदिरों में जातिगत सांस्कृतिक अपमान का आह्वान किए बिना श्रम सेवा की ऐसी संस्कृति आरएसएस-भाजपा के एजेंडे में नहीं है, भले ही उनके सदस्य और समर्थक नियमित रूप से खुद को प्रामाणिक हिंदू राष्ट्रवादी के रूप में पेश करते हैं।…
सिख धर्म ‘सरबत दा भल्ला’ (सबकी भलाई के लिए काम करना) और कार सेवा (सर्वहित के लिए शारीरिक कार्य करना) पर जोर देता है। ये दो विचार गुरु ग्रंथ की आध्यात्मिक विचारधारा का हिस्सा हैं, जो हिंदुत्ववादी ताकतों की वर्ण धर्म विचारधारा के विपरीत है। सिख गुरुओं ने उस समय श्रम की गरिमा की अवधारणा की स्थापना की जब यह विचार ब्राह्मणवादी आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा के लिए लगभग अज्ञात था।" (दि प्रिंट, 28 दिसंबर 2020)

सिख विरोधी मानसिकता की सनक में रोनकी राम पंजाब के डेरों को प्रबुद्ध स्थापित करने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। डेरे अथवा बाबे चाहे किसी भी धर्म या सम्प्रदा से हों, वह सत्ताधारी के खिलाफ कभी संघर्ष नहीं कर सकते। क्योंकि भारत में सत्ताधारी ब्राह्मणवादी तंत्र है, यहां के डेरे सदा ही ब्राह्मणवाद के लिए लाभदायक रहेंगे। जो ऊपर से ब्राह्मणवाद का विरोध करते भी दिखते हैं, वह भी समाज में जाति-धर्म के आधार पर विभाजनकारी नीतियों के चलते सत्ताधारी के फायदे में ही जाता है। अगर सक्षम कानून का राज हो तो भारत के अधिक्तर डेरों पर ताला लग जाना चाहिए था और इन्हें चलाने वाले संत (ठग) जेल के अंदर होने चाहिए थे। इनका अस्तित्व ही अपने आप में भ्रष्ट तंत्र के साथ समझोते की गवाही भर रहा है।

जिस तरह किसान अंदोलन के खत्म होने के ठीक बाद रोनकी राम ने सिखी रंगत को शून्यांकन करने तथा पीड़ित-उत्पीड़क में बराबरी स्थापित करने के लिए ‘शोध पत्र’ लिखा, उसी तरह 2007 में सिखों का डेरा सिरसा के साथ हुए टकराव के ठीक बाद सिख समाज को ही पूरी तरह कसूरवार स्थापित करने के लिए लेख लिखा जिसका शीर्षक है: Social Exclusion, Resistance and Deras- Exploring the Myth of Casteless Sikh Society in Punjab / सामाजिक बहिष्कार, प्रतिरोध और डेरे- पंजाब में जातिविहीन सिख समाज के मिथक की खोज (रोनकी राम, अक्तूबर 2007) अगर "डेरे" के नाम से पाठकों को लगता है कि रोनकी राम ने डेरों के कुकर्मों (भू माफिया, बलात्कार, अंध विश्वास, घटिया राशन या दवाईयों की बिक्री, विभाजनकारी वोट बैंक, इत्यादि) को मिली दंड रहित विवस्था का विश्लेषण किया होगा, तो पाठकों को निराशा ही हाथ लगेगी। इस सब पर चुपी उसी तरह बनाई गई है जैसे किसान आंदोलन के लेख में ‘प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी’ के नाम पर रखी थी। उल्टा रोनकी राम तो डेरों की तारीफ करते लिखते हैं:

"इस प्रकार पंजाब में दलित डेरों के उदय को राज्य में उभरती दलित चेतना और अलग दलित पहचान की संस्कृति के सूचक के रूप में देखा जा सकता है।" (रोनकी राम, अक्तूबर 2007)

लेख का सारांश यह है कि- सिख समाज में जट्टों ने दलितों का सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है, जबकि डेरों में दलितों को सम्मान मिलता है। क्योंकि दलित अपने अधिकारों का दावा ठोक रहे हैं, इसी प्रतिरोध में डेरा-सिख टकराव बढ़ रहा है।

लेख की शुरुआत से ही रोनकी राम की पटकथा में बदनियत दिख जाती है:

"डेरा सच्चा सौदा (सिरसा, हरियाणा में मुख्यालय के साथ 1948 में स्थापित समन्वित धार्मिक केंद्र) के अनुयायियों और सिखों के विभिन्न समूहों के बीच हालिया हिंसक झड़पें (मई 2007), और राज्य में जाट सिखों और दलितों के बीच अन्य प्रकार के सामाजिक संघर्ष भी, पंजाब के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इन संघर्षों का कारण "बदला लेने की अल्पकालिक राजनीति" के बारे में की जाने वाली बात से आगे और पंजाब में तथाकथित जातिविहीन सिख समाज में गहरे सामाजिक-धार्मिक पदानुक्रम को दर्शाता है। एक ओर, वह सामाजिक भेदभाव की सुप्त संरचनाओं को उजागर करते हैं, जो सिख समाज के ताने-बाने में व्याप्त हैं, और दूसरी ओर, सिख-खालसा पहचान के बारे में नव-रूढ़िवादी सिखों की चिंता की ओर इशारा करते हैं। वे न केवल राज्य में राजनीतिक स्थिरता के लिए बल्कि भारत में लोकतंत्र की संस्थाओं के लिए भी एक गंभीर चुनौती पेश करते हैं।" (रोनकी राम, अक्तूबर 2007)

डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह, जो खुद जट्ट बिरादरी से है, सिखों का उस से टकराव को जट्ट-दलित टकराव की रंगत देना ना सिर्फ झूठ है बल्कि बईमानी की पराकाष्ठा। अगर गुरमीत राम रहीम दलितों का मसीहा है, फिर रोनकी राम को चिंता किस बात की? उसका साथ देने में सरकार ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी। इस हिसाब से तो "उभरती दलित चेतना" को हर सरकार मनज़ूरी दे ही रही है। डेरा सच्चा सौदा का राजनीतिक विंग किस पार्टी को चुनाव में समर्थन करने के लिए कहेगा वहीं से "दलित पहचान की संस्कृति के सूचक के रूप में देखा जा सकता है।"

डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के घिनौने कारनामों की चर्चा बहादुर पत्रकार राम चंदर छत्रपति के नवंबर 2002 में हुए कत्ल से ही शुरू हो गई थी। छत्रपति ने बड़ी बेबाकी के साथ डेरे में होते गंभीर अपराधों को अपने अखबार ‘पूरा सच्च’ में लिखना शुरू कर दिया था। लोकतंत्र की हर तरफ से धज्जियां उड़ाकर एक घिनौने अपराधी को लंबे समय तक बचाया गया और सालों चले मुक्दमे के बाद जाकर वह अगस्त 2017 को गिरफ्तार हुआ। अकसर जब कभी ऐसे अपराधी जेल में जाते हैं तो कुछ लोग इसे ‘सिस्टम (न्याय प्रणाली) की जीत’ कहते हैं। मेरा मानना है कि इसे सिस्टम की जीत नहीं बल्कि हार कहना चाहिए। क्योंकि सिस्टम ऐसे अपराधियों को बचाने की पूरी कोशिश करता है। लिकिन जब कभी शूरवीर पत्रकार, निडर गवाह, साहसी वकील और ईमानदार न्यायधीश के सालों की तपस्या (मुक्दमे) का आलौकिक संयोग बनता है, तो सिस्टम हार जाता है।

लेकिन रोनकी राम को सिखों का राम रहीम के खिलाफ आक्रोश "राजनीतिक स्थिरता" और "भारत में लोकतंत्र की संस्थाओं के लिए भी एक गंभीर चुनौती" नज़र आ रही है। इसी सिस्टम की बात तो हम कर रहे हैं, जिसे बनाए रखने में रोनकी राम की भी ड्यूटी लगी हुई है।

अगर कोई रोनकी राम को संशय-लाभ देना चाहे कि यह लेख बहुत पुराना (अक्तूबर 2007) है। हो सकता है कि उन्होंने अपनी गलती बात में सुधार ली हो तो बता दें कि डेरों के मुद्दे पर रोनकी राम के ओर भी कई लेख हैं, वह लगातार लिखते रहते हैं। हर लेख में उन्होंने डेरों द्वारा होते जनता (अधिकांश दलित) के शोषण और उन्हें मिली दंड-रहित विवस्था पे पर्दा ही डाला है। जैसे उनका लेख है- Structures of Social Exclusion, Dera Culture and Dalit Social Mobility in Contemporary East Punjab / सामाजिक बहिष्कार की संरचनाएं, समकालीन पूर्वी पंजाब में डेरा संस्कृति और दलित सामाजिक की गतिशीलता। (रोनकी राम, नवंबर 2016)। इसमें भी यही लिखते हैं:

"मालवा में डेरा सच्चा सौदा की सघन अनुसरणता इसका उदाहरण है। मुख्यधारा की सिख गुरुद्वारा संस्कृति के बीच, सभी प्रकार के डेरों के उदय ने समकालीन पंजाब में विशिष्ट महत्व ग्रहण किया। इसने राज्य में एक अलग दलित धार्मिक स्थान को जन्म दिया जहां धर्म (सिख धर्म पढ़ें) ने सामाजिक और राजनीतिक शक्ति की संरचनाओं में गहराई से प्रवेश किया हुआ है।"

रविदास डेरों के समर्थन में वह कहते हैं:

"सभी रविदास डेरों के प्रबंधन पर आदि धर्मियों का एकाधिकार है। रविदास डेरे केवल एक धार्मिक स्थान नहीं हैं। वास्तव में, वे पंजाब में एक अलग दलित पहचान के निर्माण की चल रही सावधानीपूर्वक प्रक्रिया का प्रतीक हैं। उनकी केंद्रीय चिंता खुद को हिंदू और सिख तीर्थस्थलों से अलग पेश करने और एक वैकल्पिक धार्मिक क्षेत्र प्रदान करने की रही है जहां दलित अनुयायियों को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत नहीं है और सामाजिक बहिष्कार के नम्र हमलों का सामना नहीं करना पड़ता है।" (रोनकी राम, नवंबर 2016)

"आदि धर्मियों" से मतलब चमार जाति के एकाधिकार से है। रविदास डेरे के प्रबंध में भंगी, मजहबी या वालमीक समाज के लोगों को जगह मिल पाएगी? नहीं। तो फिर रविदास डेरे में चमार जाति के एकाधिकार को "दलित पहचान" नहीं ‘चमार पहचान’ लिखना चाहिए था। रविदास डेरों में जाति संरचना पे आधारित केवल एक जाति के एकाधिकार को रोनकी राम ने "उभरती दलित चेतना" के रूप में स्वीकार कर लिया है।

पंजाब में ईसाई मिशनरियों की कार्यवाही में बहुत वर्द्धि आई है। नव-मिशनरी भी डेरा माडल पर ही काम कर रहे हैं, जिसमें बाबा खुद को पास्टर या प्रोफैट कहता है। निर्धारित पटकथा के अनुसार मंच पर पास्टर की कृपा (प्रार्थना) से श्रद्धालू (अभिनेता) की कैंसर जैसी गंभीर बिमारियों के ठीक होने का दावा किया जाता है। इन ईसाई डेरों की चपेट में भी रविदासीया समाज सहित अधिकतर दलित ही आते हैं। पास्टर बजिंदर सिंघ, जो हरियाणवी जाट है, बलात्कार के आरोप में जूलाई 2018 में जेल जा चुका है। अगस्त 2021 के एक बहुचर्चित वीडियो में बजिंदर सिंघ ने मंच पर तथाकथित मृत बच्चे को पुनर्जीवित कर दिया। अनुयायियों ने हलिलुय के जाप के साथ खूब ताड़ियां बजाई। दिल्ली 2020 के विधान सभा चुनाव के नतीजों के बारे में प्रोफैट बजिंदर सिंघ ने भविष्यवाणी की कि "नया चेहरा आएगा" और "कुछ खिलेगा"। खिलने से मतलब भाजपा के कमल के फूल से था। भविष्यवाणी का मकसद अपने अनुयायियों को भाजपा के पक्ष में वोट डालने के ईशारे से था। ना तो नया चेहरा आया और ना ही कमल का फूल खिला, आम आदमी पार्टी दोबारा जीत गई।

पाठकों को हैरानी हो सकती है कि ईसाई प्रार्थना सभाओं में तो अकसर हिंदुत्वी संगठन हमला करते रहते हैं, फिर ईसाई प्रोफैट भाजपा का समर्थन कैसे कर सकते हैं। यही समझने वाली बात है। मरने-मारने का कार्य फुट सोलजरों का होता है। डेरा प्रमुख का हित उसके अनुयायियों से भिन्न होता है। डेरेदार उसी पार्टी को समर्थन करेगा जो उसे अधिक से अधिक निजी छूट देने का आश्वासन देगा।

रोनकी राम ने कुछ ऐसे भी उदाहरण दिए हैं जिसमें गुरुद्वारा प्रबंध को लेकर जट्ट-दलित टकराव हुआ है। जैसे- शहीद निहाल सिंघ गुरुद्वारा, तलहन गांव के दलित समाज के लोगों की गुरुद्वारा प्रबंध में अपनी अधिक नुमाइंदगी की मांग थी, जो बिलकुल जायज़ थी। जट्ट प्रबंधक परिवारों ने ना सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि गांव के दलितों का सामाजिक बहिष्कार भी किया। जून 2003 में तनाव बहुत बढ़ गया, जिसमें उग्र विरोध के चलते एक दलित की पुलिस फाईरिंग में मौत हो गई। वहीं इस टकराव से कांग्रस-अकाली-भाजपा-कम्युनिस्ट पार्टियां भी अपने राजनीतक लाभ का हिसाब किताब लगाने में पीछे ना थी। पंजाब प्रदेश कांग्रस के प्रमुख एच.एस. हंसपाल का इस घटना पर ब्यान था- "प्रशासन की ओर से घोर ढिलाई और दो दलित मंत्रियों के बीच तीखी नोकझोंक के कारण संकट ने एक बदसूरत मोड़ ले लिया।" हंसपाल ने इंडिया टुडे से चौधरी जगजीत सिंह और मोहिंदर सिंह केपी के बीच तकरार की ओर इशारा करते हुए कहा, कि प्रत्येक खुद को दलितों का असली नेता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। (इंडिया टुडे, रमेश विनायक, 23 जून 2003)

अगले कुछ महीनों में दोनो दलों के बीच गुरुद्वारा प्रबंधन का मसला सुलझा लिया गया। आज यह ‘जहाज वाला गुरुद्वारा’ के नाम से प्रचलित है। सिख गुरुद्वारों में भेद-भाव तो धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, और शोषित वर्ग का इसके खिलाफ आवाज़ उठाना सिख धर्म को ओर प्रफुल्ल करने में सहाई होता है।

यहां एक बात बताना ज़रूरी है कि पंजाब में अगर किसी एक समुदाए के ऊपर सबसे ज्यादा पुलिस अत्याचार हुआ है तो वह सिख समुदाए ही है। यकीनन यह भी सभी जातियों से थे, क्योंकि पंजाब के सिखों में जट्टों का अनुपात ज्यादा है तो मरने वालों में अधिकतर जट्ट ही होंगे। शहीद जसवंत सिंघ खालड़ा एक महानतम मानवाधिकार कार्यकर्ता हुए हैं। उन्होंने अपनी जांच और अनुमानों के आधार पर साबित किया कि पंजाब के तेरह जिलों में, 1984 से 1994 के दशक के बीच, सरकारी बलों द्वारा कुल 25000 लापता व्यक्तियों की हत्या कर दी गई और अवैध रूप से ‘लावारिस लाश’ बना कर जला दिया। मां-बाप ‘लापता’ करार दिए होने के कारण अपने बच्चों के मृत्यु प्रमाणपत्र भी हासिल ना कर पाए। खालड़ा जी ने अपने तथ्य विदेशों में जाकर और कनाडा की संसद में भी रखे। उनकी जान को खतरे के बावजूद वह अपनी जांच को जारी रखने के लिए भारत वापिस आए। जसवंत सिंघ खालड़ा को भी उनके अपने घर के बाहर से पंजाब पुलिस ने 6 सतंबर 1995 को उठा लिया जिस के बाद उन्हें कभी ना देखा गया। लावारिस लाशों की गिणती करने वाला खुद लापता हो गया और लावारिस लाश बना दिया गया। शहीद जसवंत सिंघ खालड़ा की रिपोर्ट और उनके खुद के अपहरण ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया। भारत सरकार कातल (जूनियर) पुलिस अफसरों के ऊपर मुकदमे तथा कारवाई करने के लिए मजबूर हुई जिस से पुलिस द्वारा हत्याओं में विराम लग पाया, और पंजाब शांति बहाली की तरफ बढ़ सका।

12 अक्टूबर 2015 को गांव बरगाड़ी (फरीदकोट) में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी हुई थी जिसमें दोष डेरा सच्चा सौदा के ऊपर जा रहा था। इसी मामले में सिख संगठनों व संगत द्वारा बरगाड़ी से सटे गांव बहबल कलां (कोटकपूरा) में भी धरना दिया गया था। सिखों की यही मांग थी कि दोषी को कानून के अनुसार सज़ा मिले। इसी दौरान 14 अक्टूबर 2015 को पंजाब पुलिस ने बिना किसी कारण शांतिपूर्ण धरने पर बैठ कर सतनाम वाहेगुरु का जाप कर रही सिख संगत पर गोलियां चलाई थीं। जिसमें दो सिख युवकों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। दो जांच आयोगों की रिपोर्ट अनुसार फायरिंग अकारण और अनुचित थी। जांच में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के नेतृत्व में एक जन आयोग था और दूसरा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश रंजीत सिंह के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त आयोग शामिल था। (सिख सियासत न्यूज, 18 जून 2020)

क्योंकि रोनकी राम डेरा सच्चा सौदा को दलित डेरा मानते हैं, क्या वह इस गोलीकांड को भी दलित-सिख की रंगत देकर सिखों पर होते अत्याचार को मानेंगे? ऐसा मानना गलत होगा। किसी सिख चिंतक ने समाज विरोधी डेरों को दी जाती गैर कानूनी संरक्षणा को दलित-सिख रंगत नहीं दी। आम सिख संगत अच्छी तरह से समझती है कि उनकी टक्कर भ्रष्ट विभाजनकारी सरकार से है किसी समुदाए से नहीं। यही कारण रहा कि डेरा प्रमुख राम रहीम को अनुचित संरक्षण देने के चलते अकाली दल (बादल), जो जट्टों की पार्टी कहलाती है, को 2017 के विधान सभा चुनाव में करारी हार मिली।

रोनकी राम जब भी किसी घटना (जैसे- डेरा सच्चा सौदा टकराव, तलहन कांड, इत्यादि) का ज़िकर करते हैं तो उसका मकसद केवल जाति भेद को उभारना होता है। वह दूसरे बहुआयामी अहम पक्ष को नहीं छूते। लेकिन भारती राजनीती के व्यवहार को समझे बगैर ऐसे मसलों को समझा ही नहीं जा सकता। जो सदा ही विभाजनकारी परिस्थितियों को उभारती है। इस व्यवहार का चरित कौन निभा रहा है, इस से अहम है समझना कि यह ब्राह्मणवादी मुख्यधारा तंत्र का हिस्सा है।

रोनकी राम दलितों की सिख धर्म में बराबर हिस्सेदारी के दावे को मान्यता नहीं देना चाहते। क्या भंगी, मजहबी या वालमीक समाज के लोग रविदास डेरे के प्रबंध में दावा करने की सोच भी सकते हैं? रोनकी राम के लेख दलित समाज को उकसा कर, उनके मूंह में शब्द डालकर, उन्हें विभिन्न डेरों में बट जाने की प्रेरणा देते हैं। इस तरह वह ब्राह्मणवादी विवस्था की सेवा करते हैं। एक तरफ वह सिख समाज के खिलाफ नफरत पैदा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वह दलित समाज को वोट बैंक में तबदील करके उनकी राजनीतिक चेतना को डेरा प्रमुख को मिली दंढ-छूट तक सीमत कर देते हैं।

कदाचित हमारा मकसद दलित समाज पे होते अत्याचारों या भेदभाव को नकारना नहीं है। लेकिन भेदभाव की घटनाओं को इस तरह पेश करना कि शोषित वर्ग को विभाजनकारी भ्रष्ट तंत्र के चुंगल में ओर गहरा फंसा देना, इस वृतांत को तो नकारना चाहिए। एक तरफ रोनकी राम का दलितों पर जाति आधारत अन्याय पर चिंतन करना, लेकिन दूसरी तरफ अंधविश्वास व वोट बैंक की राजनीती से अनुयायीयों का शोषण करने वाले डेरों की तरफदारी करना, विरोधाभास से भरपूर है। यह तो खरगोश के साथ दौड़ना और शिकारी कुत्तों के साथ शिकार करने की अंग्रेज़ी कहावत वाली बात है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2019 में दलितों के खिलाफ कुल अपराधों का 84% हिस्सा नौ राज्यों में था, हालांकि वे देश की अनुसूचित जाति की आबादी का केवल 54% थे। यह राज्य हैं- राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, तेलंगाना, यूपी, केरल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश। दलितों के खिलाफ अपराधों की राष्ट्रीय औसत 22.8 प्रति लाख एस.सी. जनसंख्या का था, राजस्थान में सबसे अधिक 55.6 रहा। पंजाब, जिस राज्य में अनुसूचित जाति का आबादी अनुपात सबसे अधिक है, वहां अपराधों की दर सबसे कम राज्यों में रही, प्रति लाख एस.सी. आबादी पर 1.9 अपराध। बेशक 1.9 अपराध लाख प्रति लाख अनुसूचित जाति की जनसंख्या भी क्यों हो? शुन्य होना चाहिए। लेकिन दूसरे राज्यों के मुकाबले कहीं बेहतर अच्छे आंकड़ों के पीछे सिखी मूल्यों को पहचानकर और अच्छा किया जा सकता है।

केवल दलित वर्ग के प्रति ही अपराध कम नहीं हैं, बल्कि पंजाब में दूसरे अल्पसंखयक भी बहुत सुरक्षित हैं। पंजाब में मुस्लिम आबादी 2% से कम है। मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्वियों के नफ़रती प्रचार का पंजाब में कोई असर नहीं है। इतना ही नहीं जब नवंबर 1984 में दिल्ली और देश के विभिन्न शहरों में लगभग 30000 से ज्यादा सिखों का हिंदुत्वी भीड़ (जिसमें दलित भी थे) के हाथों नरसंहार हुआ, उस समय में भी कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि सिखों की भीड़ पंजाब के हिंदुओं को मारने निकली हो। भ्रष्ट विभाजनकारी भारती राजनीती द्वारा बेहद विषम परिस्थितियों के बावजूद सिखों के मानवतावादी मूल्यों का बार-बार प्रकट होना विस्मयकारी है। इसे प्रोफेसर पूरन सिंघ के मशहूर वाक्यांश द्वारा ही संक्षेप में कहा जा सकता है- "पंजाब वसदा गुरां दे नां ते।"

रोनकी राम अपनी सिख विरोधी मानसिकता के चलते झूठ और भद्दे वर्णन से भी पीछे नहीं हटते:

"ऐसा कम ही होता है कि किसी सिख डेरे का मुखिया गैर जट्ट सिख हो। अगर होगा भी तो वह कभी दलित नहीं हो सकता। सिख डेरों में अधिकांश दलित सिखों की भागीदारी केवल विभिन्न प्रकार की तुच्छ सेवाओं के साथ-साथ पवित्र पाठ (गुरु ग्रंथ साहिब) के वर्णन और कीर्तन (पवित्र भजनों का संगीतमय प्रतिपादन) तक ही सीमित है। जो लोग कीर्तन करते हैं उन्हें रागी कहा जाता है, पेशेवर कथाकारों को ग्रंथी के रूप में नामित किया जाता है और अन्य जो सेवा प्रदान करते हैं उन्हें सेवादार कहा जाता है। अधिकांश रागी, ग्रंथी और सेवादार दलित सिख हैं। बहुत कम जट्ट सिख इस तरह के पेशे को अपनाते हैं (क्षेत्रीय बातचीत के आधार पर)।" (रोनकी राम, नवंबर 2016)

"क्षेत्रीय बातचीत के आधार पर" वर्णन ना सिर्फ झूठ है, बल्कि यह सिखों की धार्मिक भावनाओं का अनादर है। गुरु ग्रंथ साहिब जी के पाठ, कथा, कीर्तन और गुरुद्वारे में सेवा को "तुच्छ" सेवाएं (menial services) लिखना बेहद आपत्तिजनक है। रोनकी राम को यह भी बताना चाहिए था, उनके ‘प्रबुद्ध’ डेरों में कौनसी सेवाएं होती हैं? और उन सेवाओं को कौन करता है? सिख समाज में कथा या कीर्तन करने वाले प्रचारकों का बहुत आदर है। सभी जाति के लोग "इस तरह के पेशे को अपनाते हैं"। बल्कि सिख प्रचारक अपने नाम के साथ केवल ‘सिंघ’ या ‘कौर’ ही लगाते हैं। जिससे अधिकांश संगत को प्रचारक की जाति का ना तो कभी पता चलता है और ना ही कभी इसे जानने की संगत को इच्छा होती है। गुरबाणी की कथा या कीर्तन बहुत विशाल कार्यक्षेत्र है। जहां कीर्तन से गुरमत संगीत कला की ऊंचाईयों को छूने की आपार संभावनाएं हैं, वहीं कथा से गुरबाणी विचार की गहराईयों के साथ-साथ इतिहासक खोज के नए आयाम खुलते हैं। प्रसिद्धी प्राप्त कीर्तनकार और कथाकार सभी जातियों से आते हैं जो अकसर सिख समाज में प्रभावकारी व्यक्तित्व होते हैं। और उनकी प्रसिद्धी पूर्ण रूप से उनकी अपनी योग्यता के आधार पर है, ना कि किसी जाति के आधार पर।

दलितों की भूमिहीनता एक गंभीर चर्चा का विशा है। लेकिन रोनकी राम सरकार से अपेक्षा या समाधान नहीं मांगते, वह इसमे भी केवल जट्ट-दलित दृष्टिकोण की पैठ छोड़ते हैं:

"भारत में कहीं भी, दलित इतने बड़े पैमाने पर कृषि भूमि से वंचित नहीं हैं जितना कि पंजाब में। वे राज्य में कुल परिचालन जोत का केवल 5.98 प्रतिशत साझा करते हैं और खेती के तहत कुल क्षेत्रफल का केवल 3.20 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं। चूँकि पंजाब में (एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के नाते) भूमि का स्वामित्व सामाजिक स्थिति को निर्धारित करने में अत्यधिक महत्व रखता है, दलितों के बीच भूमिहीनता उनकी सामाजिक स्थिति को अत्यधिक प्रभावित करती है। दलितों के बीच अत्यधिक भूमिहीनता और वैकल्पिक रोजगार के अवसरों के अभाव ने उनमें से एक बड़ी संख्या को जमींदारों की भूमि पर काम करने के लिए कृषि श्रम में धकेल दिया, जो हमेशा जाट सिख थे।" (रोनकी राम, नवंबर 2016)

वैसे केवल पंजाब नहीं, पूरा भारत ही कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। रोनकी राम "दलितों के बीच अत्यधिक भूमिहीनता" का हर लेख में ईशारा करते हैं, मानो दलितों की ज़मीन जट्टों ने छीनी हो। वह दलित समाज को जट्ट समाज के खिलाफ भड़का कर पूंजीपतियों द्वारा संचालित अर्थव्यवस्था की सरकारी नीतियों से ध्यान भटका रहे हैं। इन नीतियों के चलते पंजाब समेत पूरे देश में किसान तो खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। इसी के चलते इतिहासक किसान आंदोलन हुआ था जिसका पंजाब के किसानो ने नेतृत्व किया था। रोनकी राम दलित समाज को किसके ईशारे पे जट्ट किसानो के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं? भूमिहीनता की बात ब्राह्मण या बनिया भी तो कर सकता है। यकीनन इसका जवाब यही मिलेगा कि ब्राह्मण-बनिया की नौकरियां या व्यापार पर पकड़ है। तो इसका मतलब यह हुआ कि भूमि-धारक या भूमि-हीन से ज्यादा अहम सवाल यह है कि सरकार की आर्थिक नीती में नागरिक को कहां रखा गया है।

अगर भूमि धारक होने से ही स्थिती ठीक हो जानी थी, तो इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाए:
"बिहार और उत्तर प्रदेश के छोटे किसानों को एक अनोखी समस्या का सामना करना पड़ता है। अपने राज्यों में जमीन के मालिक होने के बावजूद वे पंजाब और हरियाणा में मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं। कुछ प्रवासी मजदूरों का कहना है कि उनके राज्यों में खेती लाभदायक नहीं है क्योंकि उन्हें अपनी फसलों का अच्छा मूल्य नहीं मिलता है।" (अनंद पटेल, इंडिया टुडे, 17 दसंबर 2020)

वहीं दूसरी तरफ पंजाब के किसान अपनी ज़मीने बेचकर विदेशों में पलायन कर रहे हैं। "अपने गृह राज्य में सिकुड़ती भूमि जोत तेजी से अव्यावहारिक हो गई है, कई पंजाबी और पड़ोसी हरियाणा के कुछ किसानों ने भी जॉर्जिया में सस्ती जमीन खरीदने की संभावनाएं तलाशना शुरू कर दिया है..." (चंद्र सुत डोगरा, द हिंदु, 16 नवंबर 2021)। दूसरे देश जहां पंजाब के किसान कई सालों से खेती कर रहे हैं, वह हैं- कनाडा, कैलिफोर्निया, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका, अर्जेंटीना, बोलीविया, इत्यादि। हम सभ यह भी जानते हैं कि पंजाब से पलायन करके अधिकांश लोग विदेशों में मज़दूरी तथा ट्रक ड्राइवरी भी करते हैं।

कहने का मतलब यह हुआ कि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसानी से होने वाली आय से पंजाब और हरियाणा में मजदूरी की आय अधिक है। और पंजाब में किसानी से होने वाली आय से विदेशों में मजदूरी तथा किसानी की आय अधिक है। भारत में कृषि बेहद बुरे समय से गुज़र रही है। बढ़ते कर्ज के चलते पूरे भारत वर्ष में किसानो की आत्महत्याओं की खबरें आम बात हो गई है। पंजाब सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में भी साल 2000-2019 में 3,300 किसानों ने आत्महत्या की है।

रोनकी राम के लेखों में सरकार की उन आर्थिक नीतियां की ममीक्षा पूरी तरह से गायब हैं जिसके चलते देश की संपत्ति कुछ पूंजीपतियों के कब्जे में जा रही हैं। इन नीतियों के कारण भारत में असमानता भयंकर रूप से बड़ रही है। किसान मज़दूर दोनो इन नीतियों का सीधे रूप से शिकार हो रहे हैं। ऐसे में किसान-मजदूर ऐकता ज़िंदाबाद का नारा बुलंद होना चाहिए।

बढ़ते कृषि संकट के बीच चाहे दलितों की भूमिहीनता को कम करना कोई असरदार हल तो नहीं, पर कुछ हद तक लाभकारी हो सकता है। पंजाब के दलितों की भूमिहीनता को कम करने के लिए खेती के लिए उपलब्ध शामलात भूमि (गांव की सांझी भूमि) का उपयोग एक रास्ता मौजूद है। राज्य सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार, राज्य में कुल 1.57 लाख एकड़ शामलात भूमि खेती के लिए उपलब्ध है। इसमें से लगभग एक तिहाई या लगभग 53,000 एकड़ अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और उन्हें वार्षिक पट्टे पर दिया जाता है। लेकिन लच्चर कानून विवस्था के चलते कई बार यह ज़मीन भी ज़रूरतमंद दलितों को मिलने की बजाए, इन पर गैर कानूनी ढंग से प्रभावकारी ज़मीदार कब्ज़ा कर लेते हैं। प्रभावकारी ज़मीदार अधिकांश जट्ट होने के कारण इसे जट्ट-दलित की रंगत दी जा सकती है, लेकिन यह विभाजनकारी लच्चर कानून विवस्था को भी दर्शाता है। जमीं प्राप्ति संघर्ष कमेटी के नाम से एक संगठन पंचायत भूमि पर दलितों द्वारा संयुक्त खेती की पैरवी कर रहा है। लेकिन कानून को खुद-ब-खुद काम करना चाहिए था। हालांकि, इसका एक स्थायी समाधान है कि राज्य सरकार को गांवों के अनुसूचित जाति के लोगों को खेती के लिए उपलब्ध शामलात भूमि को पूर्ण स्वामित्व और पट्टा या टाइटल डीड के साथ दे देना चाहिए।

यहां पर अनंदपुर साहिब रैज़ोलूशन (1973) की कुछ मांगों का भी ज़िकर करना बनता है:

"प्रस्ताव संख्या 3:
(आर्थिक नीति संकल्प)
शिरोमणि अकाली दल की आर्थिक नीतियों और कार्यक्रम के प्रेरणा के मुख्य स्रोत गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंघ की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समाजवादी अवधारणाएं हैं। हमारा आर्थिक कार्यक्रम तीन सिद्धांतों पर आधारित है:
(क) श्रम की गरिमा।
(ख) एक आर्थिक और सामाजिक संरचना जो समाज के गरीब और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए प्रदान करती है।
(ग) पूंजीपतियों के हाथों में आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण का बेरोकटोक विरोध।
.....
शिरोमणि अकाली दल अगले दस वर्षों के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों से बेरोजगारी मिटाने का आह्वान करता है। इस उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए, कमजोर वर्गों, अनुसूचित और दलित वर्गों, श्रमिकों, भूमिहीन और गरीब किसानों और शहरी गरीब किसानों और शहरी गरीबों की स्थिति में सुधार पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए। इन सबके लिए न्यूनतम मजदूरी तय होनी चाहिए।
.....
शिरोमणि अकाली दल दृढ़ता से महसूस करता है कि अनुसूचित वर्गों से संबंधित लाखों शोषित व्यक्तियों की स्थिति को सुधारने की सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या है। ऐसे उद्देश्य के लिए शिरोमणि अकाली दल केंद्र और राज्य सरकारों से विशेष धन निर्धारित करने का आह्वान करता है। इसके अलावा, राज्य सरकारें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों को मुफ्त आवासीय भूखंड देने के लिए अपने-अपने बजट में पर्याप्त धनराशि आवंटित करें।
.....
प्रस्ताव संख्या 8
शिरोमणि अकाली दल के इस सम्मेलन में केंद्र और राज्य सरकारों से गरीबों और मजदूर वर्गों पर विशेष ध्यान देने की अपील की गई और मांग की गई कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम में उपयुक्त संशोधन करने के अलावा मजदूर वर्ग की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए उपयुक्त कानूनी कदम उठाए जाएं, जिस से एक सम्मानजनक जीवन जीने और देश के तीव्र औद्योगीकरण में उपयोगी भूमिका निभाने में सक्षम बन पाएं।
.....
प्रस्ताव संख्या 11
शिरोमणि अकाली दल की यह विशाल सभा भारत सरकार पर बहुत जोर देती है कि अनुसूचित और गैर-अनुसूचित जातियों के आर्थिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए उनके कल्याण के लिए बजट में उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रावधान किया जाना चाहिए। उन्हें आरक्षण के आधार पर न्याय दिलाने के लिए व्यावहारिक उपाय के रूप में केंद्र में एक विशेष मंत्रालय बनाया जाना चाहिए।
सत्र में सरकार से यह भी आह्वान किया गया है कि पहले से किए गए समझौते को ध्यान में रखते हुए देश के किसी भी हिस्से में सिख और हिंदू हरिजनों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।"

अनंदपुर साहिब रैज़ोलूशन (1973) की मांगे केवल सिख या पंजाब विशेष नहीं थी, यह दलित वर्ग के हित में तथा भारत के संघीय ढांचे को बचाने की कोशिश थी। लेकिन इसे हिंदु-सिख का मुद्दा बना दिया गया, जिसमें सिखों के खिलाफ वामपंथी और हिंदुत्वी एक साथ खड़े थे। इन मांगों को लेकर सिखों ने धर्म युद्ध मोर्चा लगाया जिसे कुचलने के लिए भारत सरकार ने जून 1984 को सिखों के दिल और केंद्रीय धार्मिक स्थान दरबार साहिब, अमृतसर में फौजी हमला किया। इस हमले में कई बेगुनाह बच्चे, जवान, बूड़े और महिलाओं को मार दिया गया।

इन सभ जटिलताओं को छुपाते हुए रोनकी राम भूमिहार-भूमिहीन के नाम पर जट्ट-दलित की विभाजनकारी कार्यावली कर रहे हैं। लेकिन जाने अनजाने में रोनकी राम से कुछ पते की बात भी लिखी गई है:

"लेकिन जट्ट सिखों के विपरीत, दलित तीक्ष्णता से 38 जातियों में विभाजित हैं, जो विभिन्न धर्मों (हिंदू धर्म, सिख धर्म, ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म) में बिखरे हुए हैं, ज्यादातर भूमिहीन, आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं, सामाजिक रूप से उत्पीड़ित और राजनीतिक रूप से उपेक्षित हैं। यह जाट सिखों और दलितों के अन्यथा संख्यात्मक रूप से तुलनीय समुदायों के बीच अत्यधिक असमानता के संदर्भ में है कि जाति पदानुक्रम का विशिष्ट पैटर्न पंजाब में विवेचनात्मक महत्व रखता है।" (रोनकी राम, अक्तूबर 2007)

रोनकी राम ने ठीक लिखा कि जहां पंजाब के लगभग सभी जट्ट एक ही धर्म (सिख) से हैं, पंजाब के दलित लगभग 38 जातियों और 4 धर्मों में बटे हैं। बल्कि डेरे इन्हें ओर कई हिस्सों में विभाजित कर देते हैं। दलितों का कई गुटों में विभाजित होना उन्हें एक संगठनात्मक शक्ति बनने से रोकता है। हम यही बात बताने की कोशिश रहे हैं कि सिख धर्म ही एकमात्र प्लैटफ़ार्म (संगत) प्रदान करता है जिसने सभी वर्गों के लोगों को एक सिद्धांत के नीचे इकट्ठा किया। इस प्लैटफ़ार्म ने सभी जनजातियों, कबीलों की खूबियों को एक दूसरे से सांझा करने का अवसर दिया।

भीलवाड़ा, राजस्थान, से दलित लेखक भंवर मेघवंशी ने अपनी आत्मकथा लिखी है- "मैं एक कारसेवक था"। वह तेरह साल की उम्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे। उन्होंने माना की संघ दलित और आदिवासी समाज को मरने मारने के लिए फुट सोलजर की तरह इस्तमाल करती है। 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए अधिकतर दलितों को ही आगे रखा गया था, जिनके मन में मुसलमानो के प्रति नफरत पैदा की गई थी। भंवर मेघवंशी भी ‘कार सेवा’ के लिए भीलवाड़ा से ट्रेन में बैठे थे, पर उन्हें अयोध्या पहुंचने से पहले ही आगरा में अस्थाई जेल में 10 दिनों के लिए बंद कर लिया गया। जब भंवर मेघवंशी को दलित होने के कारण अपने ऊपर बीते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दलितों के प्रति निम्न विचारों का अहसास हुआ, तब उन्होंने संघ को त्यागकर अपना अनुभव दूसरों से सांझा करने की ठानी। वह लिखते हैं:

"मैंने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने की बजाय सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया और एक प्रतिज्ञा की कि मैं अब हर तरीके से संघ और संघ परिवार के समूहों तथा उनके दोगले विचारों की बोलकर, लिखकर और अपने क्रियाकलापों के जरिये मुखालफत करूंगा." (मैं एक कारसेवक था, भँवर मेघवंशी)

यह कटु सत्य है कि दलित समाज को हिंसा की घटनाओं में फुट सोलजर की तरह इस्तमाल किया जाता रहा है। नवंबर 1984 में सिखों का कत्लेआम, 1992 में बाबरी विध्वंस, गुजरात 2002 में मुसलमानों का नरसंहार, या दिल्ली 2020 में मुसलमानों के प्रति हिंसा। भंवर मेघवंशी जिस मानसिकता से मुक्त होकर दूसरों को सचेत कर रहे हैं, रोनकी राम सिखों के प्रति नफरत घोलकर उसी गुलाम मानसिकता से दलितों को डेरों के लिए फुट सोलजर तैयार कर रहे हैं। बड़े अफसोस की बात है कि यह दलित चिंतन के नाम पर स्वीकार किया जा रहा है।

दलित साहित्य किसे कहा जाए और किसे नहीं? क्या गैर-दलित द्वारा लिखा साहित्य दलित साहित्य कहा जा सकता है? दलित समाज में इस विषय पर गंभीर चर्चा चल रही है। दलित या गैर-दलित की बहिस में साफ नीयत और बदनीयत की पहचान धूमिल नहीं पढ़नी चाहिए। सच्चे आचार एवं कथनी-करनी के सूरे चिंतकों द्वारा दलित समाज की जागरुकता, उत्थान और एकजुटता के लिए लिखा साहित्य ही कल्याणकारी दलित साहित्य कहा जा सकता है। सच चाहे सदैव अग्रिम होता है, लेकिन सच के भी ऊपर सच्चा आचार है:
सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, महला १, पृष्‍ठ 62)

हमने इस लेख की शुरुआत उन कलमों से की थी जिन्हें जला देना (पहचानना) बहुत ज़रूरी है। क्योंकि डर, लालच, ईर्ष्या, द्वेष व निजि स्वार्थों की बाध्यता में लिखे गए लेख समाज को पहले से भी अधिक बंधनों में जकड़ लेते हैं। समाज का उधार वह धन्य कलम व लेखारी ही कर सकते हैं से हैं जिन्होंने निरभउ निरवैर नाम के मानक पर खरा सच लिखा हो:
धंनु सु कागदु कलम धंनु धनु भांडा धनु मसु ॥
धनु लेखारी नानका जिनि नामु लिखाइआ सचु ॥ (गुरु ग्रंथ साहिब, महला १, पृष्‍ठ 1291)

गुरप्रीत सिंघ जीपी.

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ਭਗਤ ਨਾਮਦੇਵ ਜੀ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਚਮਤਕਾਰਾਂ ਦਾ ਇਤਿਹਾਸਕ ਤੇ ਵਿਚਾਰਧਾਰਕ ਮੁਲਾਂਕਣ

ਚਾਹੀਦਾ ਤਾਂ ਇਹ ਸੀ ਕਿ ਗੁਰਬਾਣੀ ਨੂੰ ਅਧਾਰ ਬਣਾਕੇ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀ ਪੜਚੋਲ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ। ਪਰ ਪੂਜਾਰੀ ਕਹਾਣੀ ਨੂੰ ਅਧਾਰ ਬਣਾਕੇ ਗੁਰਬਾਣੀ ਨੂੰ ਉਸ ਵਿਚ ਫਿੱਟ ਕਰਦਾ ਹੈ।

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