डॅा. धर्मवीर का आजीवक धर्म
डॅा. धर्मवीर की किताब का विश्लेषण पाठकों के लिए लाभकारी होगा, इसलिए कि एक ही बार में बहुत सारे पथभ्रष्ट विचारों की चर्चा की जा सकती है जिनसे समाज को सावधान होना ज़रूरी है

आज दलित समाज में असमानता पे खड़ी विवस्था के खिलाफ उल्लेखनीय जाग्रती आई है। बहुत से दलित चिंतक खुल कर ब्राह्म्णवाद के खिलाफ बोल-लिख रहे हैं, जिसे हज़ारों सालों से धर्म के नाम पर बेचा जा रहा था। पर जितना बड़ा दलित समाज है और जिस बड़े पैमाने पर लोगों में मान्यताओं के नाम पर भ्रम हैं, अभी बहुत कार्य अधूरा है और जनशक्ति की बेहद कमी है। इस कमी के चलते कई बार ऐसे लोग भी बुद्धिजीवियों की श्रेणी में गिने जाने लगते हैं जो संदेहों को खड़ा करके संधर्ष को दिशाहीन कर सकते हैं। इसी श्रेणी में डॅा. धर्मवीर का नाम गिना जाना चाहिए जो पुनर्जन्म को तो नहीं मानते, जो अच्छी बात है, परंतु सदियों पहले लुप्त हो चुके आजीवक धर्म को ‘पुनर्जन्म’ देने की अवास्तविका में दूसरों को भ्रमित कर रहे हैं। डॅा. धर्मवीर की किताब ‘महान आजीवक- कबीर, रैदास और गोसाल’ का विश्लेषण पाठकों के लिए लाभकारी होगा, इसलिए नहीं कि उन्होंने साहित्य में कोई मानदण्ड स्थापित किया है, बल्कि इसलिए कि एक ही बार में बहुत सारे पथभ्रष्ट विचारों की चर्चा की जा सकती है जिनसे समाज को सावधान होना ज़रूरी है।
आजीवक धर्म की स्थापना मक्खलि गोसाल द्वारा की गई मानी जाती है। मक्खलि गोसाल महावीर (जैन) के समकाली और बोद्ध धर्म से पहले हुए हैं। इनकी विचारधारा का वर्णन करते हुए डॅा. धर्मवीर अपनी किताब ‘महान आजीवक- कबीर रैदास और गोसाल’ में लिखते हैं:
"ब्राह्मणों, बौद्धों और जैनियों के पुनर्जन्म में विश्वास रखने वाले सिद्धान्त के बाद अब मक्खलि गोसाल के आजीवक चिन्तन पर आया जाए। पुनर्जन्म पर उनके क्या विचार हैं? उनके विचार यह है कि पुनर्जन्म नहीं होता। उनका पहला सूत्र है- ना धम्मो ‘त्ति। उनका दूसरा सूत्र है- ना तवो ‘त्ति। उनका तीसरा सूत्र है- नत्थि पुरिस्कारे। कोई ऐसा धर्म नहीं है जो तुम्हें मरने के बाद अमुक योनि में पैदा कर देगा; कोई ऐसा तप नहीं है जो तुम्हें मरने के बाद अमुक योनि में पैदा कर देगा; कोई ऐसा पुरस्कार नहीं है जो तुम्हें मरने के बाद पुनर्जन्म के रूप में मिलने वाला है। तभी पुनर्जन्म को हटा कर मक्खलि गोसाल ने ‘नियति’ का शब्द दिया है। गोसाल के इसी सिद्धान्त को मध्य काल में हमारे रैदास और कबीर ने आगे बढ़ाया था।"
"हमारे रैदास और कबीर" में पाठक "हमारे" की शब्दावली के उपर ज़रूर ध्यान दें। "हमारे" में कौन आता है और कौन नहीं, आगे चलकर और स्पष्ट होगा।
‘नियतिवाद’ का सिद्धांत आजीवक धर्म का मूल है। परन्तु इसे समझने के लिए डॅा. धर्मवीर जो सलाह देते हैं वह इस प्रकार है:
"नियति पर अधिक शास्त्रीय जानकारी कहाँ से प्राप्त की जाए जो आजीवक दर्शन को समझने में मदद कर सकता है? इस के लिए जैन ग्रंथों की सहायता ली जा सकती है क्योंकि आजीवक धर्म और जैन धर्म का आपसी आरम्भिक रिश्ता रहा है। इस का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि नियति पर जो विचार जैन दर्शन के हैं, हू-ब-हू वे ही विचार नियति पर आजीवक दर्शन के भी हैं। उन में फर्क है, और भारी फर्क है, पर अच्छी बात यह है कि सन्दर्भ बना रहता है।"
आजीवक धर्म के मूल सिद्धांत को समझने के लिए आजीवकों को दूसरे धर्मों के ग्रंथ ही पड़ने होंगे। यह ऐसे है जैसे कि इसाई धर्म की जानकारी आप कुरान या हदीस से लें। या फिर इस्लाम की जानकारी नागपुर से छपती संघियों (RSS) की किताबों से प्राप्त करें। यकीनन यह हास्यास्पद है। आजीवक धर्म पे ऐतिहासिक तल पे शोध तो हो सकता है, पर एक ऐतिहासकार का दूसरे से भिन्न परिणाम निकालना समान्य है। ऐतिहासिक खोज पे खड़ा धर्म पैगंबर का नहीं बल्कि खोजकर्ता की सीमत समझ पे अधारित रहेगा। ऐसे धर्म के अनुयायी पैगंबर को समझने के भ्रम में खोजकर्ता के चिंतन तक सीमत रह जाते हैं। इसलिए जिस आजीवक धर्म की बात डॅा. धर्मवीर कर रहे हैं, वह गोसाल का नहीं, डॅा. धर्मवीर का अपना है। डॅा. धर्मवीर ने तो गोसाल, कबीर और रैदास का बस नाम इस्त्माल किया है, बात उन्होंने अपनी ही की है। आजीवकों के लिए अपने धर्म को जानने के लिए गोसाल को नहीं डॅा. धर्मवीर को ही पड़ना होगा। इस कारण आजीवकों की समझ और उत्थान डॅा. धर्मवीर की समझ से आगे नहीं बड़ सकती।
ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ की विचारधारा का अगर थोड़ा भी विश्लेषण किया जाए तो विरोधाभास प्रत्यक्ष दिखने लगेगा। जिन सिद्धांतो और दर्शन के अवशेष ‘बाहरी’ लोगों के ग्रंथों से ढूंढने की बात की जा रही थी, वहीं आजीवकों को बाहरी लोगों से सावधान रहने के लिए इसी किताब की भूमिका में इस तरह लिखते हैं:
"इशाारा यह है कि बाहरी लोगों का एक हिस्सा जरूर आजीवक धर्म और दर्शन में आने की कोशिश करेगा। आजीवकों की सफलता यह रहेगी कि किसी एक बाहरी आदमी को भी इस में न आने दिया जाए। आजीवक समाज इसे धरती पर अपनी सबसे बड़ी लड़ाई और होशियारी समझे। यदि वे बाहरी आदमियों को आजीवक दार्शनिक और धार्मिक होने से रोक सके तो फिर उन्हें किसी दूसरी अक्ल की ज़रूरत नहीं है। यह समझा जाए कि इसी जगह पूरा घमासान होना है। इस के लिए आजीवक समाज हर रोज चौकस और तैयारी में रहे और अपने धर्म और दर्शन की इन बाहरी लोगों से रक्षा करता रहे।"
डॅा. धर्मवीर अपनी किताब के प्रसंग की समाप्ति इन पंक्तियां से करते हैं:
"निष्कर्ष यह है कि रैदास और कबीर आदि अपने किसी भी आजीवक महापुरष के बारे में किसी भी ब्राह्मण की लिखी कोई भी पुस्तक न पढ़ी जाए तो उस से आजीवकों को अपने आजीवक धर्म को समझने में सदैव आसानी रहेगी।"
बात सुनने में सही लग सकती है। पर बात सिर्फ ब्राह्मण लेखकों को ना पड़ने की नहीं है। वो आजीवक लेखक कौन हैं जिन्हें पड़ना है? क्या खुद को आजीवक घोषित करके और पुनर्जन्म नकार देने से ही कोई ब्राह्मणी प्रभाव से मुक्त हो जाएगा? इतना सरल तो यकीनन नहीं है। आंतरिक भाव तो यही हुआ जिसे डॅा. धर्मवीर सही कहें वो सही है, जिसे वह गलत कहें वो गलत।
यह संकीर्ण सोच किसी तरह भी ब्राह्मणी सोच से भिन्न नहीं है। दोनो ही जन्म के अधार पर खुद को श्रेष्ठ मानते हुए ‘बाहरी लोगों’ को अपने धर्म में शामिल होने से रोकते हैं। डॅा. धर्मवीर की विचारधारा समानता के लिए संधर्ष में से नहीं निकली, बदले और वैर की भावना से निकली है। तभी तो डॅा. धर्मवीर कहते हैं कि कबीर ने यह सूत्र दिया है कि "जो व्यक्ति ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में अन्तर करता है, समझ लो, उस ने ब्राह्मण को समझना बन्द कर दिया है।" यह भगत कबीर जी को भी खुद की तरह नस्लवादी समझते हैं। भगत जी तो हर किसे में अल्लाह का नूर देखते हैं और जन्म के अधार पे किसे को भला या मंदा नहीं कह सकते। भगत जी उसी ज्ञान को पूरा कहते हैं जो सब जीवों (भूत) में एक प्रभु के समाए होने का अहसास करवाए जिस से सब विवादों का नाश हो:
अवलि अलह नूर उपाइआ कुदरत के सभ बंदे ॥
एक नूर ते सभ जग उपजिआ कउन भले को मंदे ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, भगत कबीर, पृष्ठ 1349)
सरब भूत एकै कर जानिआ चूके बाद बिबादा ॥
कह कबीर मै पूरा पाइआ भए राम परसादा ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, भगत कबीर, पृष्ठ 483)
भगत कबीर जी जब देखते हैं कि ब्राह्मण खुद को श्रेष्ठ जाति होने के भ्रम में जीवन व्यर्थ गवा रहा है तो वह उसे भी अहंकार से रोगमुक्त होने की सीख देते हैं। वह समझाते हैं कि जन्म के कारण अगर ब्राह्मण उच्च होता तो उसका पैदा होने का रास्ता ‘आन बाट’ (अलग) होता। शूद्र की रगों में अगर खून है तो ब्राह्मण की रगों में कोई दूध नहीं बह रहा। माता के गरभ में किसी की कोई जाति नहीं होती। भगत जी ब्राह्मण पर दया करते हैं और उसे भी एक नूर का वह ज्ञान देते हैं जिस से ब्राह्मण ब्राह्मणवाद से मुक्त हो सके:
गरभ वास मह कुल नही जाती ॥ ब्रहम बिंद ते सभ उतपाती ॥१॥
कहु रे पंडित बामन कब के होए ॥ बामन कह कह जनम मत खोए ॥१॥ रहाउ॥
जौ तूं ब्राहमण ब्रहमणी जाइआ ॥ तउ आन बाट काहे नही आइआ ॥२॥
तुम कत ब्राहमण हम कत सूद ॥ हम कत लोहू तुम कत दूध ॥३॥
कहु कबीर जो ब्रहम बीचारै ॥ सो ब्राहमण कहीअत है हमारै ॥४॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, भगत कबीर, पृष्ठ 324)
डॅा. धर्मवीर यहीं नहीं रुकते, वह अपने नफरत से भरे अपशब्द सतपुरुषों के मूँह में डालने का दुष्कर्म करते हैं। वह भगत कबीर और भगत रामानंद में कल्पनिक वार्तालाप ब्यान करते हैं जो असल में उनके अपने अंदर की भड़ास है। दरअसल डॅा. धर्मवीर कुछ लेखकों द्वारा भगत रामानंद जी को भगत कबीर जी का गुरु कहने से परेशान हैं। वह कहते हैं-
"कबीर के गुरु मक्खी और मच्छर हो सकते थे, कबीर के गुरु कुत्ते और बिल्ली हो सकते थे लेकिन रामानंद ब्राह्मण उनके गुरु कभी नहीं हो सकते थे।"
इसी परेशानी के कारण वह एक लंबा कल्पनिक वार्तालाप लिखते हैं जो इस तरह शुरु होता है:
रामानंद कहते हैं- "तू जुलाहा है, तू नीच है।" कबीर कहते हैं- "तू घमंडी है, तू बावन रूपी है।" रामानंद कहते हैं- "जुलाहे, तुझे नीच होने के कारण मोक्ष का अधिकार नहीं है, तू जाकर खड्डी पर कपड़े बुन।" कबीर कहते हैं- "बमने, तुझे घमंडी होने के कारण कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। तू दुनिआ में लबड़ लबड़ करता फिरेगा, सब से लड़ता फिरेगा, तुझे शान्ति नहीं मिलेगी, तेरा जन्म अभिशप्त है।" ...
गुरु ग्रंथ साहिब जी के सिख के लिए अपने रहनुमाओं के नाम से इस तरह की भद्दी और घृणास्पद शब्दावली दुखद है। सच्चे बोल और कड़वे बोलों में अंतर है। रुहानी रास्ते पर चलने वालों का स्वभाव भी अपने प्रभु स्वामी की तरह मीठे बोलों वाला होता है जो कभी किसी को कड़वा बोल नहीं बोलता। गुरबाणी का फुरमान है:
मिठ बोलड़ा जी हर सजण सुआमी मोरा ॥
हउ समल थकी जी ओह कदे न बोलै कउरा ॥
कउड़ा बोल न जानै पूरन भगवानै औगण को न चितारे ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, महला ५, पृष्ठ 784)
सिख के लिए ना तो इस बात से कोई परेशानी है कि भगत कबीर जी के गुरु भगत रामानंद जी थे, ना ही इस बात से कि भगत रामानंद जी के गुरु भगत कबीर जी थे। सिख का चिंतन किंवदंतियों पे आधारित नहीं है। सिख को तो गुरबाणी विचार की असीम गहराईयों में उतर कर हीरे-मोती रूपी सदगुणों को हासिल करना है और यही खजाना दूसरों में बांटना है। क्योंकि सिख का गुरु ‘शब्द’ है, वह शब्द जो उसके पैगम्बरों द्वारा प्रमाणिक है। यह प्रमाणिक्ता आजीवक धर्म के पास नहीं है। ‘शब्द गुरु’ के मूल सिद्धांत को समझे बिना सिखी के बारे में कोई भी विश्लेषण सही हो ही नहीं सकता।
ब्राह्मण जाती में पैदा होने के कारण डॅा. धर्मवीर के मन में जिन भगत रामानंद जी के लिए इतनी नफरत है, गुरु ग्रंथ साहिब जी में उनका भी एक शब्द है। लेखकों ने भगत रामानंद जी के बारे में क्या कहानियाँ या दन्तकथाएं लिखी हैं, वह सिख के विश्वास का हिस्सा नहीं हो सकती। सिख के लिए भगत रामानंद जी वही हैं जो गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज इस एक शब्द के अनुकूल हों:
कत जाईऐ रे घर लागो रंग ॥ मेरा चित न चलै मन भइओ पंग ॥१॥ रहाउ॥
एक दिवस मन भई उमंग ॥ घस चंदन चोआ बह सुगंध ॥
पूजन चाली ब्रहम ठाइ ॥ सो ब्रहम बताइओ गुर मन ही माहि ॥१॥
जहा जाईऐ तह जल पखान ॥ तू पूर रहिओ है सभ समान ॥
बेद पुरान सभ देखे जोइ ॥ ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ॥२॥
सतिगुर मै बलिहारी तोर ॥ जिन सकल बिकल भ्रम काटे मोर ॥
रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ॥ गुर का सबद काटै कोट करम ॥३॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, रामानंद जी, पृष्ठ 1195)
अर्थ: हे भाई! और कहाँ जाऐं? (अब) हृदय-घर में ही मौज बन गई है; मेरा मन अब डोलता नहीं, स्थिर हो गया है।1। रहाउ।
एक दिन मेरे मन में भी यह चाहत पैदा हुई थी, मैंने चंदन घिसा के इत्र व अन्य कई सुगंधियाँ ले लीं, और मैं मन्दिर में पूजा करने चल पड़ी। पर अब तो मुझे वह परमात्मा (जिसको मैं मन्दिर में रहता समझती थी) मेरे गुरु ने मेरे मन में ही बसता दिखा दिया है।1।
(तीर्थों पर जाऐं चाहे मन्दिरों में) जहाँ भी जाऐं वहाँ पानी है अथवा पत्थर हैं। हे प्रभु! तू तो हर जगह एक समान भरपूर (व्यापक) है, वेद-पुराण आदि धर्म-पुस्तकें भी खोज के देख ली हैं। मैं तीर्थों या मन्दिरों में तब ही जाऊँ अगर परमात्मा मेरे मन में ना बसता हो।2।
हे सतिगुरु! मैं तुझसे सदके जाता हूँ, जिसने मेरे सारे मुश्किल भुलेखे दूर कर दिए हैं। रामानंद का मालिक प्रभु हर जगह मौजूद है, गुरु का शब्द करोड़ों कर्मों (भ्रान्तियों) का नाश कर देता है।3।
नोट: भगत रामानंद जी जाति के ब्राहमण थे। पर, धर्म-नायक ब्राहमणों के द्वारा डाले हुए भुलेखों का इस शब्द में खण्डन करते हैं कि तीर्थों के स्नान, चंदन का लेप और मूर्ति-पूजा से मन की अवस्था ऊँची नहीं हो सकती। पूरे गुरु की शब्द विचार से सारे भुलेखे दूर हो जाते हैं, और, परमात्मा हर जगह व्यापक और अपने अंदर बसता दिख जाता है। यकीनन भगत रामानंद जी ब्राह्मण जाति में पैदा तो हुए, पर ब्राह्मणवाद से खुद भी मुक्त थे और दूसरों को भी मुक्त करवा रहे थे।
गुरु ग्रंथ साहिब जी में सभी भगतों में से सबसे ज्यादा बाणी कबीर जी की दर्ज है। धर्मवीर के पास प्रमाणिक्ता की कोई कसौटी तो नहीं है, पर वह भगत कबीर जी की बाणी के लिए ‘बीजक’ ग्रंथ को अधिक मान्यता देते हैं। धर्मवीर ने बिना किसे अर्थ विचार के भगत कबीर और भगत रविदास जी के नाम से बहुत से काव्य लिखे हैं। इन में बहुत सी रचनाओं में ना तो सिद्धांत की स्थिरता है और ना ही काव्य की रूहानी उत्कृष्टता। अगर जीवन में शब्द विचार का अभ्यास किया होता तो इन हल्की रचनाओं को सतपुरुषों से नाम से ना जोड़ा जाता। बात समझने के लिए धर्मवीर द्वारा कबीर के नाम से प्रचारित काव्यों के तीन उदाहरण देखिए:
क) ये अंखियां अलसानी हो, पिय सेज चलो। खंभ पकर पतंग अस डोलै, बोलै मधुरी बानी।
फूलन सेज बिछाय जो राख्यो, पिया बिना कुम्हिलानी॥
धीरे पांव धरो पलंगा पर, जागत ननद जिठानी।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, लोक लाज बिलछानी॥ (55)
विश्लेषण: आध्यात्मिक काव्य शैली में परमेश्वर को पति या पिया कहते हैं, इसमें कोई दुविधा नहीं। लेकिन पलंग के ऊपर धीरे पांव क्यों रखना है? पलंग क्या है? ननद जठानी से क्या तात्पर्य हुआ, जिन्हें जगाना नहीं चाहिए? अगर ‘पलंग’ को मन, और ‘ननद जठानी’ को मन के विकार भी समझ लें, फिर भी आध्यात्मिक पक्ष रखने का यह कोई शालीन ढंग नहीं है। पिया के किन गुणों को धारण करना है और कौन से विकारों को जगाने से रोकना है, इसका कोई निर्देश नहीं। ऐसी अशोभनीय शैली भगत कबीर जी के उन शब्दों से मेल नहीं खाती जो गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं।
ख) सैंया निकस गयो, मैं ना लड़ी थी।
ना मैं बोली, ना मैं चाली, ओढ़ चदरिआ अकेली पड़ी थी।
पांच देवरनियां पचीस जेठनियां, ना जानो कुछ इनने कही थी।
रंग महल में दस दरवाजा, ना जानो कौन खिड़की खुली थी।
कहै कमाली कबीर की बेटी, इस ब्याही ते कुमारी भली थी। (72)
विश्लेषण: इस काव्य की आखरी पंक्ति से ही साफ हो जाता है कि यह कबीर जी का नहीं है, उनकी बेटी कमाली के नाम से लिखा गया है। इस काव्य को भगत कबीर जी की वाणी लिख देना ही, धर्मवीर की शब्द विचार प्रती गैर-गंभीरता को दर्शाता है। इसके अर्थ करने पर पता चलेगा कि कवि अहंकार में लिप्त है। सैंया (प्रभु) के नाराज़ होने का बोध तो है, मगर अपनी कोई गलति नहीं दिखाई दे रही- ना तो लड़ी, ना कुछ गलत बोली, ना ही गलत रास्ते पर चाली। ‘पांच देवरनियां’ पांच विकार और ‘दस दरवाजे’ ज्ञान इंद्रियां हो सकते हैं, मगर ‘पचीस जेठनियां’ कौन हैं? ‘ब्याही ते कुमारी भली’ का मतलब तो यह हुआ कि प्रभु सैंया की संगत पसंद नहीं आई। यह कैसा धार्मिक उपदेश हुआ?
ग) बिरहा बिरहा मत कहो, बिरहा है सुलतान। जा घट बिरह न संचरे, सो घट जान मसान। (131)
विश्लेषण: इस काव्य में ‘कबीर’ नाम की मोहर नहीं है। असल में यह बाबा फरीद जी की बाणी है। उसमें थोड़ी तबदीली करके बाबा कबीर जी के नाम से संकलन कर दिया गया है। यह शब्द गुरु ग्रंथ साहिब जी में इस तरह से दर्ज है:
बिरहा बिरहा आखीऐ बिरहा तू सुलतान ॥
फरीदा जित तन बिरह न ऊपजै सो तन जाण मसान ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, शेख फरीद, पृष्ठ 1379)
गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज भगत कबीर जी की बाणी में कहीं भी विरोधाभास नहीं है। कबीर जी खुद समझाते हैं, लोग शब्द-विचार को केवल (साधारण सा) गीत समझ बैठते हैं, पर ये तो परमात्मा के गुणों की विचार है, जो अहंकार से जीते-जी मुक्ति दिलाता है:
लोग जानै इह गीत है इह तउ ब्रहम बीचार ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, भगत कबीर, पृष्ठ 335)
गुरु ग्रंथ साहिब जी से बाहर भगतों के नाम पर बहुत सी रचना मिलती है जो जिज्ञासु को विरोधाभास में डाल देती है। यह अति ज़रूरी नुक्ता है जिसकी गंभीरता को समझते हुए सिख गुरुओं ने ना केवल गुरु ग्रंथ साहिब जी का खुद संपादन किया बल्कि ‘कच्ची बाणी’ से दूर रहने का स्पष्ट फुरमान दिया:
सतिगुरू बिना होर कची है बाणी ॥ बाणी त कची सतिगुरू बाझह होर कची बाणी ॥
कहदे कचे सुणदे कचे कचीं आख वखाणी ॥ हर हर नित करह रसना कहिआ कछू न जाणी ॥
चित जिन का हिर लइआ माइआ बोलन पए रवाणी ॥ कहै नानक सतिगुरू बाझह होर कची बाणी ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, महला ३, पृष्ठ 920)
डॅा. धर्मवीर का बेमेल चिंतन आजीवकों का कहां तक उत्थान कर पाएगा? इसकी तुच्छ सीमा की एक झलक उनके द्वारा भारत के संविधान के किए गुणगान से मिलती है। जैसे, वह लिखते हैं:
"भारत के संविधान के मूल अधिकार वाले भाग में मिला समता का अधिकार, स्वातंत्र्य अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार आजीवकों की बहुत बड़ी सफलता है। शिक्षा के अधिकार और भोजन के अधिकार की संवैधानिक गारन्टी आजीवकों की प्राप्ति का एक बड़ा उत्सव है। संविधान में राज्य की निती के निदेशक तत्व वाले भाग के अनुच्छेद 51क(ज) में यह लिखा जाना कि ‘भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह ...... वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें,’ आजीवक धर्म और दर्शन की सर्वोपरि विजय है। यहां नियतिवाद ‘संविधान बनाम पुनर्जन्म’ बन कर अपनी जीत की घोषणा कर रहा है।"
उनका यह विचार ना सिर्फ नासमझी दर्शाता है बल्कि बईमानी भी।
बईमानी: बईमानी इसलिए कि संविधान में लिखी हर अच्छी बात को वह आजीवकों की सफलता बताते हैं पर आजीवकों का नाम नहीं लेते। नाम इसलिए नहीं लेते क्योंकि नाम की सूची जारी करते हुए उन्हें डॅा. बी. आर. अम्बेदकर का नाम लिखना पड़ता जो संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष थे। और मसौदा समिति के दूसरे सदस्यों के नाम भी लिखने पड़ते जिनमे स्वर्ण और मुस्लिम भी थे। डॅा. धर्मवीर ब्राह्मणो का नाम लिखें यह तो उम्मीद नहीं की जा सकती थी, वह तो डॅा. अम्बेदकर को भी कोई रियायत देने का ईमान नहीं रखते। डॅा. अम्बेदकर का दलित समाज के लिए अतुलनीय योगदान ‘गंगा बहा देने’ के समान है, पर डॅा. धर्मवीर उन्हें "जड़ों से दूर" कहते हैं। ऐसा नहीं कि डॅा. अम्बेदकर की आलोचना नहीं हो सकती, ज़रूर होनी चाहिए। आलोचना का मकसद नई परिस्थितियों और जानकारी के चलते पिछली गलतियों को सुधार कर समाज को और उन्नत करना होना चाहिए। लेकिन अगर आलोचना दूसरे को नीचा दिखाने की बदनियत से हो तो इसका असर कबूलने वाला वर्ग और पिछड़ जाएगा, यही पाप डॅा. धर्मवीर कर रहे हैं। वह लिखते हैं:
"मूल्यांकन यह है कि जो बात डॅा. अम्बेदकर ने ठीक कही है वह आजीवक होने के नाते कही है और जो बात बेठीक कही है वह बोद्ध बनने के नाते कही है।"
इसी तर्क (कुतर्क) के अधार पर डॅा. अम्बेदकर का नाम लिख देते, क्योंकि संविधान तो उनके बोद्ध धर्म अपनाने से बहुत पहले त्यार हो चुका था। संविधान ही क्यों, उनका ज्यादा कार्य और लेखन तो बोद्ध धर्म अपनाने से पहले का है, तो क्या उस सब से डॅा. धर्मवीर सहमत हैं?
यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि संविधान मसौदा समिति ने कई दूसरे देशों और उनके संविधानों से भी प्रेरणा ली थी। उदाहरण के लिए:
क) सरकार का संसदीय स्वरूप ब्रिटिश शासन शैली से लिया गया था। कानून का शासन और एकल नागरिकता की अवधारणा ब्रिटिश संविधान से अपनाए गए कुछ ज़रूरी पहलू थे।
ख) मौलिक अधिकारों का चार्टर, सरकार का संघीय ढांचा, न्यायिक समीक्षा और संविधान की प्रस्तावना कुछ ऐसे तत्व थे जो अमेरिका से लिए गए थे।
ग) स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श फ्रांसीसी संविधान से लिए गए थे।
तो क्या ब्रिटेन, अमरीका, फ्रांस, इत्यादि ने भी आजीवक धर्म और दर्शन से प्रेरणा ली थी?
नासमझी: संविधान को लेकर डॅा. धर्मवीर का उल्लास ज़मीनी वास्तविकता की नासमझी के कारण है। क्या वह यह नहीं जानते कि दुनिया के सबसे ज्यादा भूख से पीड़ित लोग भारत में रहते हैं, और भारत की कुल आबादी का 14% हिस्सा अल्पपोषित है? वैश्विक भूख सूचकांक (Global Hunger Index) 2020 की रीपोर्ट के अनुसार भारत 107 देशों में शर्मनाक 94वें स्थान पर है। संविधान में ‘भोजन के अधिकार’ लिख देने से किस बात का उत्सव? यह उत्सव भूख से मर रहे लोगों पर भद्दा मज़ाक है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण लिख देने से कैसी ‘सर्वोपरि विजय’? गणेश के मानव-सिर की जगह हाथी का सिर लगाने को प्रधान मंत्री द्वारा शल्य-विज्ञान (surgery) बताने को क्या संविधान रोक पाया? जहाँ गाय के मूत्र और गोबर से बनी चीज़ों को आयुर्विज्ञान माना जाता हो, वहाँ ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ लिख देने से क्या लाभ?
जो संविधान ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की जगह काल्पनिक राम जन्मभूमी मंदिर को बनाने की सम्मति देता हो, क्या वह प्राचीन मंदिरों के नीचे दबे बोद्ध विहारों को उजागर करने की अनुमति देगा? अगर नहीं, तो समता का अधिकार कैसे हुआ?
क्या संविधान में अधिकारों को लिख देने से न्याय विवस्था पहले से बहतर हो गई? अमेरिका का मूल संविधान केवल चार पन्नो का है, जबकि अमरीकी नागरिकों की समृद्धि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रजातंत्रिक अधिकार और न्याय विवस्था भारत से कहीं ऊपर है।
नियतिवाद के चिंतन से बनी समझ की यही तुच्छ सीमा है। हार को ही जीत का नाम दे दो। संविधान में क्या लिखा है इस से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि जो लिखा है उसकी व्याख्या करने का अधिकार किस के पास है।
जब अधिकार सिखों के पास आया तो नागरिकों की समृद्धि, न्याय विवस्था और अमन भाईचारे की मिसाल को दुनिया ने स्वीकारा है। बीबीसी वर्ल्ड हिस्ट्रीज़ पत्रिका (BBC World Histories Magazines) ने चोटी के इतिहासकारों से चुनाव करवाया और मार्च 2020 में रिपोर्ट छपी जिसमे अकबर, विंस्टन चरचिल, अब्राहम लिंकन को पछाड़ते हुए महाराजा रंजीत सिंघ को "सर्वकालिक महान नेता" घोषित किया "जिसने शक्ति का प्रयोग किया और मानवता पर सकारात्मक प्रभाव डाला।" इसका कारण बताते हुए लिखा- "सिंघ केवल एक विजेता से अधिक था। जबकि भारतीय उपमहाद्वीप शाही प्रतिस्पर्धा, धार्मिक संघर्ष और युद्धों से ग्रस्त था, महाराजा रंजीत सिंघ, लगभग अद्वितीय रूप से, स्थिरता, समृद्धि और सहिष्णुता के लिए एकजुटता के सूत्रधार थे।"
महाराजा रंजीत सिंघ से पहले पंजाब में प्रमुख बारह सिख मिस्लों का राज था जिसने किसान-मज़दूर के अपने हाथ में ताकत देने की ज़मीन त्यार की थी। यह मिस्लें सिखों के हर वर्ग से मिलकर बनी थीं। रामगड़िया मिस्ल में अधिकतर लोहार और तरखान सिख थे और यह सबसे शक्तिशाली मिस्लों में से एक थी। 1783 में दिल्ली फतेह में इसका प्रमुख योगदान था। इस मिस्ल के मुखिया सरदार जस्सा सिंघ रामगड़िया ने लाल क़िला से तख्त-ए-ताऊस को उखाड़ के हरिमंदर साहिब, अमृतसर में भेंट किया था। इसी तख्त-ए-ताऊस पर बैठकर औरंगज़ेब ने गुरु तेग बहादर जी और तीन सिखों को शहीद करने का फरमान जारी किया था। महाराजा रंजीत सिंघ ने इन मिस्लों को संगठित करके विशाल खालसा राज स्थापित किया। सिखों के सत्ता पाने से पहले मुघलों और अफगानो से भीषण युद्ध हुए और असह्य यातनाएं झेली। लेकिन राज मिलने के बाद हिन्दु, सिख, मुस्लिम, सभी बराबर के शहरी थे, क्योंकि सिखी के संविधान का पहला पाठ निरभउ और निरवैर के रुहानी गुणो का सुमेल सिखाता है जो नियतीवाद बनाम पुर्नजन्म की निर्मूल बहिस से परे है।
निष्कर्ष यह है कि डॅा. धर्मवीर की विचारधारा नस्लवाद और नफरत पे अधारित होने के कारण संकीर्णता और विरोधाभास से भरपूर है। अपनी विचारधारा की स्पष्टता है नहीं, पर हर किसे दूसरे की बुराई करना ही इनका चिंतन है। ब्राह्मण का विरोध केवल मुहाना है, आंतरिक रूप से यह ब्राह्मणी तंत्र के सहाय हैं। क्योंकि ब्राह्मणवादी तंत्र को ऐसे विरोध से कोई फ़र्क नहीं पड़ता अगर विरोधी आपस में विभाजित रहें। ब्राह्मणी तंत्र अपने विरोधियों की आपसी फूट में से ही अपना क़िला मज़बूत कर लेता है। डॅा. धर्मवीर शोषित वर्ग में पथभ्रष्टता और आपसी फूट डालकर यही मज़बूती ब्राह्मणवाद को प्रदान करते हैं। डॅा. धर्मवीर की विचारधारा को उभारना मानो अपने ही घर को अपने हाथों से आग लगाना। ऐसे लोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है? आईऐ ‘हमारे आपके हम सबके सांझे’ भगत कबीर जी से जाने:
हर जस सुनह न हर गुन गावह ॥ बातन ही असमान गिरावह ॥१॥
ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ ॥ जो प्रभ कीए भगत ते बाहज तिन ते सदा डराने रहीऐ ॥१॥ रहाउ॥
आप न देह चुरू भर पानी ॥ तिह निंदह जिह गंगा आनी ॥२॥
बैठत उठत कुटिलता चालह ॥ आप गए औरन हू घालह ॥३॥
छाड कुचरचा आन न जानह ॥ ब्रहमा हू को कहिओ न मानह ॥४॥
आप गए औरन हू खोवह ॥ आग लगाइ मंदर मै सोवह ॥५॥
अवरन हसत आप हहि कांने ॥ तिन कउ देख कबीर लजाने ॥६॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, भगत कबीर, पृष्ठ 332)
अर्थ: जो लोग ना कभी प्रभु की महिमा सुनते हैं, ना हरि के गुण गाते हैं, पर बातों ही बातों में (जैसे) आसमान गिरा लेते हैं।1।
ऐसे लोगों के बारे में क्या कहा जाए? जो प्रभु की भक्ति से वंचित हैं (उन्हें समझाने की जगह) उनसे सदा दूर-दूर ही रहना चाहिए।1। रहाउ।
(वह लोग) खुद तो (किसी को) एक चुल्ली जितना पानी भी नहीं देते, पर निंदा उनकी करते हैं जिन्होंने गंगा बहा दी हो।2।
बैठते-उठते (हर समय वे) टेढ़ी चालें ही चलते हैं, वे अपने आप से तो गए-गुजरे हैं ही, और लोगों को भी गलत रास्ते पर डालते हैं।3।
फोकी बहिस के बिना वे और कुछ करना जानते ही नहीं, किसी बड़े से बड़े जाने-माने समझदार की बात नहीं मानते।4।
अपने आप से गए-गुजरे वे लोग और लोगों को भी भटकाते हैं, वे (मानो, अपने ही घर को) आग लगा के घर में ही सो रहे हैं।5।
वे खुद तो काणे हैं (कई तरह के विकारों में फंसे हुए हैं) पर औरों का मजाक उड़ाते हैं। ऐसे लोगों को देख के, हे कबीर! शर्म आती है।6।
(भाई निर्मल सिंघ खालसा जी की मधुर अवाज़ में इस शब्द के कीर्तन का आनंद ज़रूर लें- Click here)
गुरप्रीत सिंघ ‘जी.पी’
(Original Post edited with more information on 12/07/21)



