भगत बनाम गुरु एक निरमूल मुद्दा
भगत या गुरु की शब्दावली के प्रयोग में अंतर का कारण ऐतिहासिक है, वैचारिक नहीं

कुछ लोग रविदास जी को ‘भगत’ और नानक जी को ‘गुरु’ संबोधित करने पर एतराज़ करते हैं। भगत बनाम गुरु के प्रश्न में सिख विचारधारा की बुनियादी समझ का अभाव है। इस नासमझी के कारण वह समाज में बटवारा करते हैं, जिससे ब्राह्मणी ताकतों को ही बल मिलता है।
सिखी में, गुरु ग्रंथ साहिब जी की गुरबाणी को ही गुरु माना है:
बाणी गुरू गुरू है बाणी विचि बाणी अम्रितु सारे ॥
गुरु बाणी कहै सेवकु जनु मानै परतखि गुरू निसतारे ॥ (गुरु ग्रंथ साहिब, महला ४, Page 982)
अर्थ: (हे भाई! गुरु की) वाणी (सिख की) गुरु है, गुरु वाणी मे मौजूद है। (गुरु की) वाणी में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (है, जिसको सिख हर वक्त अपने हृदय में) संभाल के रखता है। गुरु वाणी उचारता है, (गुरु का) सेवक उस वाणी पे अमल करता है। गुरु उस सिख को यकीनी तौर पर संसार-समुंदर से पार लंघा देता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में बाबा फरीद, बाबा रविदास, बाबा कबीर, बाबा नानक की बाणी बराबर है, कोई अंतर नहीं है। गुरु ग्रंथ साहिब जी की बाणी ही सिखों के लिए गुरु हैं। भगत या गुरु की शब्दावली के प्रयोग में अंतर का कारण ऐतिहासिक है, वैचारिक नहीं। इन्हीं नामों के साथ यह सतपुरुष जनता के बीच लोकप्रिय हुए।
जब बाबा नानक जी ने देश के विभिन्न प्रांतो से सतपुरुषों की बाणी इकट्ठी की तो उन्हें भगत के नाम से ही जाना जाता था। इसी प्रकार, बाबा नानक को उनके अनुयायियों ने उनके जीवन के आखरी चरण में गुरु कहना शुरु किया और गुरु का नाम उनके और दस गुरुओं के साथ जुड़ गया। इस सवाल को अगर इन क्रांतिकारियों के अनुयायियों से पूछा जाता कि उन्होंने उनके जीवन काल में इन्हें गुरु क्यों नहीं कहा? जाहिर है, उत्तर यही मिलता कि उस समय में यह कोई मुद्दा ही नहीं था। गुरु नानक जी ने केवल उस नाम का उपयोग किया है जो उस समय उनके लिए लोकप्रिय था। फरीद जी को शेख़ फरीद लिखा क्योंकि उनके अनुयायी उन्हें शेख़ ही कहते थे।
गुरबाणी में भगत, गुरु और संत पर्यायवाची शब्द हैं। गुरु रविदास या गुरु कबीर बोलने में किसी को कोई समस्या नहीं है। किंतु सिखों का जब भगत कहने पर विरोध होता है, तो समाज में फूट का कारण बनता है। सिखों के लिए भगत शब्द के प्रति असीम आस्था है जिसकी महिमा वह रोज़ाना गुरु ग्रंथ साहिब जी के पाठ, कथा या कीर्तन द्वारा करते हैं।
भगता की चाल निराली ॥
चाला निराली भगताह केरी बिखम मारगि चलणा ॥
लबु लोभु अहंकारु तजि त्रिसना बहुतु नाही बोलणा ॥
खंनिअहु तिखी वालहु निकी एतु मारगि जाणा ॥
गुर परसादी जिनी आपु तजिआ हरि वासना समाणी ॥
कहै नानकु चाल भगता जुगहु जुगु निराली ॥ (गुरु ग्रंथ साहिब, महला ३, Page 918)
आधुनिक इतिहासकारों ने 'भक्ति लहर' का नाम देकर बिखम मारग पे चलने वाले क्रांतिकारियों को ब्राह्मणवादी भक्ति की छाप देते हुए भ्रमित किया है। गुरबाणी का भगत इतिहासकारों के भक्त के समान नहीं है। गुरुकुल की ब्राह्मणवादी विचारधारा के अनुसार तो गुरु शब्द भी जात-पाती संकीर्ण अर्थ में ही लिया जाता है। तो क्या गुरु शब्द को भी नकार दें? गुरु और भगत शब्दों की गरिमा को गुरबाणी और सिखी ने ही बचा कर रखा है। जो लोग रविदास समाज को सिखी से जुड़कर ब्राह्मणवादी तंत्र से आज़ाद होता नहीं देखना चाहते, वह ही भगत और गुरु की निरमूल बहिस में उलझाते हैं। अगर सिखी ने गुरु शब्द की गरिमा को बरकरार ना रखा होता तो क्या फिर भी यह लोग रविदास जी के नाम के साथ गुरु लगाने में मान महिसूस करते? यां फिर इतिहासकारों द्वारा दिया गया एकलव्य का अंगूठा काटने वाली ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ के वर्णन से गुरु शब्द को भी नकार देते?
भगत और गुरुओं ने तो खुद ही अपने लिए भगत नामकरण का उपयोग किया है।
पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥
जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमे जगि ओइ ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, रविदास, Page 858
नानक भगता सदा विगासु ॥ सुणिऐ दूख पाप का नासु ॥ (गुरू ग्रंथ साहिब, महला १, Page 2)
कबीर बामन गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥
अरझ उरझ कै पच मूआ चारउ बेदहु माहि ॥ (कबीर, गुरू ग्रंथ साहिब, Page 1377)
जिस तरह से गुरु शब्द की गरिमा को स्वीकृत किया जा चुका है, ज़रुरत है भगत को भी नकारें नहीं, स्वीकृत करें, और गुरू ग्रंथ साहिब जी से मार्गदर्शन लें।
-- गुरप्रीत सिंघ



